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सोमवार, 18 नवंबर 2013

"पेड़ जंगल के सयाने हो गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो नये थे वो पुराने हो गये हैं।
पेड़ जंगल के सयाने हो गये हैं।।

वक्त की रफ्तार ने जीना सिखाया,
जिन्दगी ने व्याकरण को है भुलाया,
प्यार-उल्फत के ठिकाने खो गये हैं।

अब तरानों में नहीं वो आग है,
सुर नहीं हैं, बेसुरा सा राग है,
चहकते नक्कारखाने सो गये हैं।

शब्द बदले और कोमल भाव बदले,
अर्थ बदले, प्रीत के अनुभाव बदले,
चूर सब सपने सुहाने हो गये हैं।

स्वार्थ के रँग में रँगे अनुबन्ध हैं,
बस दिखावे के लिए सम्बन्ध हैं,
“रूप” अपने भी बिराने हो गये हैं।

13 टिप्‍पणियां:

  1. समय से पहले ही सयाने होना पड़ता है आज हर किसी को ... प्राकृति भी अपवाद नहीं ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही अच्छी कविता लिखी है शास्त्री जी आपने भूतकाल को वर्त्तमान के साथ बहुत ही चतुराई और सुंदरता के साथ स्थापित किया है

    शास्त्री जी हमें भी अपना शिष्य बना लीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन भाव संयोजित किये हैं आपने ....
    आभार उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति का

    उत्तर देंहटाएं
  4. वक्त की रफ्तार ने जीना सिखाया,
    जिन्दगी ने व्याकरण को है भुलाया,
    प्यार-उल्फत के ठिकाने खो गये हैं।
    बहुत सुंदर.
    नई पोस्ट : मेघ का मौसम झुका है

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार१९/११/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. पेड़ जंगल के सयाने हो गए .. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. पेड़ जंगल के सयाने हो गए ..
    बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  8. स्वार्थ के रँग में रँगे अनुबन्ध हैं,
    बस दिखावे के लिए सम्बन्ध हैं,
    “रूप” अपने भी बिराने हो गये हैं।

    बहुत सुन्दर है।

    उत्तर देंहटाएं

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