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शनिवार, 16 नवंबर 2013

"जीवन का गीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

♥ नौका में है छेद कहीं ♥
देश-वेश और जाति-धर्म का ,
मन में कुछ भी भेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा,
अब जाने का भी खेद नहीं।।

सरदी की ठण्डक में ठिठुरा, गर्मी की लू झेली हैं,
बरसातों की रिम-झिम से, जी भरकर होली खेली है,
चप्पू तो हैं सही-सलामत, नौका में है छेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा,
अब जाने का भी खेद नहीं।।

सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया,
दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा,
अब जाने का भी खेद नहीं।।

आशा और निराशा ही तोजीवन की परिभाषा है,
कभी गरल है, कभी सरल है, बुझती नहीं पिपासा है,
गलियाँ आज लहू से रंजित, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा,
अब जाने का भी खेद नहीं।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. मन के भावों का सुन्दर प्रगटीकरण-
    आभार गुरुवर

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय शास्त्रीजी
    आपने तो जीने की कला बता दी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. विरल जीवन दृष्टि एवँ दर्शन की बेहतरीन अभिव्यक्ति है यह रचना ! आपको बहुत-बहुत साधुवाद शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 18/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।



    उत्तर देंहटाएं
  5. देश-वेश और जाति-धर्म का ,
    मन में कुछ भी भेद नहीं।
    भोग लिया जीवन सारा,
    अब जाने का भी खेद नहीं।।

    सरदी की ठण्डक में ठिठुरा, गर्मी की लू झेली हैं,
    बरसातों की रिम-झिम से, जी भरकर होली खेली है,
    चप्पू तो हैं सही-सलामत, नौका में है छेद कहीं।
    भोग लिया जीवन सारा,
    अब जाने का भी खेद नहीं..

    बहुत सुन्दर सन्देश परक संतोष देती संतोष को भी प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. अच्छा बुरा सब देखा सब भोगा...
    भोग लिया जीवन सारा,
    अब जाने का भी खेद नहीं।।

    दार्शनिकता का बोध कराती रचना, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

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