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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

"हो गया इन्सान बौना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
है यहाँ जीवन कठिन,
वातावरण कितना सलोना।
बाँटता सुख है सभी को,
मखमली जैसा बिछौना।

पेड़-पौधें हैं सजीले,
खेत हैं सीढ़ीनुमा,
पर्वतों की घाटियों में,
पल रही है हरितिमा,
प्राणदायक बूटियों से,
महकता जंगल का कोना।

शारदा, गंगो-जमुन का,
है यहीं पर स्रोत-उदगम,
मन्दिरों-देवालयों की,
छटा अद्भुत और अनुपम,
किन्तु आकर कुछ दरिन्दे,
खेल रचते हैं घिनौना।

चोटियों पर बर्फ की चादर
यहाँ किसने बिछायी,
घाटियों में नीर की गागर,
छनक-छन-छनछनायी,
देख कुदरत का करिश्मा,
हो गया इन्सान बौना।

इन पहाड़ों की सतह में,
बस रहे कुछ प्राण भी हैं
कंकड़ों और पत्थरों में
रम रहे भगवान भी हैं,
नाम है पत्थर मगर,
पाषाण हैं अनमोल सोना।
 बाँटता सुख है सभी को,
मखमली जैसा बिछौना।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. कितना मनभावन रचा, अद्भुत रचनाकार |
    जीव-जंतु पगडंडियां, शिखर स्रोत्र जलधार |

    शिखर स्रोत्र जलधार, पार मानव ना पावे |
    बहुत बहुत आभार, शैल वन हृदय सुहावे |

    है धरती पर स्वर्ग, घूम लो चाहे जितना |
    शांत होय मन व्यग्र, दृश्य मनभावन कितना ||

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपके प्रदेश की बात ही कुछ और है...वहाँ जा के भगवान् हावी हो जाता है...और इंसान बौना...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (16-11-2013) "जीवन नहीं मरा करता है" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1431” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह बहुत खूब ....कविता के रूप में सच सामने रख दिया है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर प्रस्तुति,साभार धन्यवाद,प्रकृति के दर्शन कराने के लिये.

    उत्तर देंहटाएं
  7. शारदा, गंगो-जमुन का,
    है यहीं पर स्रोत-उदगम,
    मन्दिरों-देवालयों की,
    छटा अद्भुत और अनुपम,
    किन्तु आकर कुछ दरिन्दे,
    खेल रचते हैं घिनौना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह आ0 शास्त्री जी सच मे हो गया इंसान बौना । सुंदर रचना ।

    उत्तर देंहटाएं

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