साहित्यकार समागम

मित्रों।
दिनांक 4 फरवरी, 2018 (रविवार) को खटीमा में मेरे निवास पर साहित्यकार समागम का आयोजन किया जा रहा है।

जिसमें हिन्दी साहित्य और ब्लॉग से जुड़े सभी महानुभावों का स्वागत है।

कार्यक्रम विवरण निम्नवत् है-
दिनांक 4 फरवरी, 2018 (रविवार)
प्रातः 8 से 9 बजे तक यज्ञ
प्रातः 9 से 9-30 बजे तक जलपान (अल्पाहार)
प्रातः 10 से अपराह्न 1 बजे तक - पुस्तक विमोचन, स्वागत-सम्मान, परिचर्चा (विषय-हिन्दी भाषा के उन्नयन में
ब्लॉग और मुखपोथी (फेसबुक) का योगदान।
अपराह्न 1 बजे से 2 बजे तक भोजन।
अपराह्न 2 बजे से 4 बजे तक कविगोष्ठी
अपराह्न 5 बजे चाय के साथ सूक्ष्म अल्पाहार तत्पश्चात कार्यक्रम का समापन।
(
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री का निवास, टनकपुर-रोड, खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड)
अपने आने की स्वीकृति अवश्य दें।
सम्पर्क-9368499921, 7906360576

roopchandrashastri@gmail.com

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शनिवार, 14 दिसंबर 2013

"विविध दोहावली-पच्चीस दोहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


(१)
उल्लू को भाता नहींदिन का प्यारा साथ।
अंधकार को खोजतासदा मनाता रात।।
(२)
चिड़िया बैठी गा रहीकरती यही पुकार।
सदा महकता ही रहेजीवन का संसार।।
(३)
धरती प्यासी थी बहुतजन-जीवन बेहाल।
धान लगाने के लिएलालायित गोपाल।।
(४)
माँगा पानी जब कभीलपटें आयीं पास।
जलते होठों की यहाँकौन बुझाये प्यास।।
(५)
बात-बात में हो रहीआपस में तकरार।
प्यार-प्रीत की राह मेंआया है व्यापार।।
(६)
उमड़-घुमड़कर आ रहेअब नभ में घनश्याम।
दुनिया को मिलने लगागर्मी से आराम।।
(७)
झुकी पत्तियाँ पेड़ की, करती है प्रणाम।
बरसो बारिस जोर से, मिलता है आराम।।
(८)
धरा-गगन में हो रहाउत्सव का माहौल।
चपला देती रौशनीबादल बोले बोल।।
(९)
बैठा जीवन शाख पेपाखी गाता गीत।
बीते युग को याद करबजा रहा संगीत।।
(१०)
बीज उगा जब धरा मेंशुरू हो गया चक्र।
लेकिन मानव कर रहाअपनी भौहें वक्र।।"
(११)
नेह हमारा साथ हैईश्वर पर विश्वास।
अन्धकार को चीर केफैले धवल उजास।।
(१२)
सावन आया झूमकरबम-भोले का नाद।
चौमासे में मनुज तूशंकर को कर याद।।
(१३)
कदम-कदम पर सुलगतेजीवन में अंगार।
अश्कों से कैसे बुझेंज्वाला के अम्बार।।
(१४)
गेहूँ की है दुर्दशामहँगाई की मार।
देख रही है शान सेभारत की सरकार।।
(१५)
तेला जी ने रच दियेहास्य-व्यंग्य के रंग।
अपने भारत देश केबिगड़ गये हैं ढंग।।
(१६)
सहज योग की प्रेरणाकरती है कुलश्रेष्ठ।
आओ जन्म सुधार लेंसीख सिखाते ज्येष्ठ।।
(१७)
दौलत पाने के लिएतान रहे बन्दूक।
जीवित माता-पिता कालूट रहे सन्दूक।।
(१८)
अपने झण्डे के लिएडण्डे रहे सँभाल।
जनमानस को ठग रहेभरते घर में माल।।
(१९)
राजनीति की बिछ रहींचारों ओर बिसात।
आम आदमी पर पड़ीकेवल शह और मात।।
(२०)
नौका लहरों में फँसीबेबस खेवनहार।
ऐसा नाविक चाहिएजो ले जाये पार।।
(२१)
काली छतरी ओढ़ केआते गोरे लोग।
बारिश में करते सभीछाते का उपयोग।।
(२२)
सपन सलोने नैन मेंआते हैं दिन-रात।
लेकिन सच होती नहींइन सपनों की बात।।
(२३)
"सूरज आया गगन मेंफैला धवल प्रकाश।
मूरख दीपक हाथ लेखोज रहा उजियास।।
(२४)
कब तक बीनेगा इसेपूरी काली दाल।
बैठा है जिस शाख पेकाट रहा वो डाल।।
(२५)
महँगाई की मार सेजन-जीवन है त्रस्त।
निर्धनश्रमिक-किसान केहुए हौसले पस्त।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. पच्चीसा सुन्दर रचा, शामिल बढ़िया कथ्य |
    शिल्प सुगढ़ है दीखता, हैं सटीक सब तथ्य ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. राजनीति की बिछ रहीं, चारों ओर बिसात।
    आम आदमी पर पड़ी, केवल शह और मात।।

    बहुत सही कहा है..प्रशंसनीय दोहे !

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति सुन्दर .सराहनीय औत सत्य

    उत्तर देंहटाएं
  4. गीता-जयन्ती' का का पर्व आप को मंगल- मय हो !
    एक रोचक रचना के लिये आप को वधाई ! मित्र, भारतीय पिंगल- शात्र के प्रति आप का आदर देख कर मुझे आशा जग जाती है !
    मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर श्रीमद्भगवद्गीता गीता पर कुछ नए विचार देखें !!

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  5. विविधता लिये भावपूर्ण सुन्दर दोहे ...!

    उत्तर देंहटाएं
  6. राजनीति और समाज की विसंगतियों ,प्रकृति की खूब सूरती को एक साथ उद्घाटित करती दोहावली।
    राजनीति की बिछ रहीं, चारों ओर बिसात।
    आम आदमी पर पड़ी, केवल शह और मात।।

    नौका लहरों में फँसी, बेबस खेवनहार।
    ऐसा नाविक चाहिए, जो ले जाये पार।।
    महँगाई की मार से, जन-जीवन है त्रस्त।
    निर्धन, श्रमिक-किसान के, हुए हौसले पस्त।।

    उल्लू को भाता नहीं, दिन का प्यारा साथ।
    अंधकार को खोजता, सदा मनाता रात।।

    उत्तर देंहटाएं
  7. "सूरज आया गगन में, फैला धवल प्रकाश।
    मूरख दीपक हाथ ले, खोज रहा उजियास।।
    बहुत सुंदर रचना.

    उत्तर देंहटाएं

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