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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

1950वीं पोस्ट "चले आये भँवरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


शीतल धरा और शीतल गगन है
कड़ाके की सरदी में, ठिठुरा बदन है

उड़ाते हैं आँचल, हवा के झकोरे,
काँटों की गोदी में, पलता सुमन है

मिली गन्ध मधु की, चले आये भँवरे
मेरी बेबसी देख, हँसता चमन है

परेशान नदियाँ है, नालों के डर से.
करने को दूभर हुआ आचमन है

भरी “रूप” में आज कितनी मिलावट
झूठी खुशी दे रही अंजुमन है

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-12-2013) "हर टुकड़े में चांद" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1468 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं
  2. मिली गन्ध मधु की, चले आये भँवरे
    मेरी बेबसी देख, हँसता चमन है
    ....बहुत सही ..बहुत बढ़िया रचना...

    उत्तर देंहटाएं

  3. परेशान नदियाँ है, नालों के डर से.
    करने को दूभर हुआ आचमन है

    खूब सूरत अंदाज़ अर्थ और भाव।

    उत्तर देंहटाएं

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