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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

"पनप रहा व्यभिचार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भारत की बेटी
दामिनी को श्रद्धाञ्जलि

हालत बदली कुछ नहीं, बीत गया इक साल।
रोज़ अनेकों दामिनी, हो जातीं बदहाल।।
--
कपड़े उजले हो भले, मैला कारोबार।
गाँव गली हर खेत में, पनप रहा व्यभिचार।।
--
अब तक भी कानून में, हुए नहीं बदलाव।
करते नहीं उपाय कुछ, देते मात्र सुझाव।।
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हार गया है लोक अब, जीत गया है तन्त्र।
सिर्फ किताबों में बचे, सदाचार के मन्त्र।।
--
कैसे श्रद्धासुमन मैं, करूँ समर्पित आज।
ठोकर खाकर भी नहीं, सुधरा देश-समाज।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १७/१२/१३को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है|

    उत्तर देंहटाएं
  2. सशक्त दोहा गीत। प्रासंगिक कथा वस्तु सार लिए।

    हार गया है लोक अब, जीत गया है तन्त्र।
    सिर्फ किताबों में बचे, सदाचार के मन्त्र।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पुराने ढर्रे पर चलने वाले कभी नहीं बदलेंगे !
    नई पोस्ट चंदा मामा
    नई पोस्ट विरोध

    उत्तर देंहटाएं
  4. सब के सब शातिरबैठे हैं
    सत्ता के गलियारें में
    लगा के लाखों चेहरे अपने
    देश बेचते गलियारे में

    कुछ तो बदला
    हार गया है लोक अब, जीत गया है तन्त्र।
    सिर्फ किताबों में बचे, सदाचार के मन्त्र।।
    --
    कैसे श्रद्धासुमन मैं, करूँ समर्पित आज।
    ठोकर खाकर भी नहीं, सुधरा देश-समाज।।

    उत्तर देंहटाएं

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