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शनिवार, 7 दिसंबर 2013

"चाँदी की संगत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक')


सुन्दर पैबन्दों को पाकर,
मखमल जैसा, टाट बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।

गया अँधेरा-हुआ सवेरा,
उखड़ गया है तम का डेरा,
सूरज की किरणों को पाकर,
कितना सुन्दर प्रात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।
शाखों पर कलिकाएँ महकीं,
तितली सी बालाएँ चहकीं,
मुस्काते उपवन में आकर,
चन्दन जैसा गात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।


भँवरों में आ गई जवानी,
करते हैं गुंजार सुहानी,
फूलों की महफिल में जाकर,
अनुरागी विख्यात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।


सुस्ती भागी-मस्ती जागी,
त्यागी बन बैठे अनुरागी,
माया और मेनका पाकर,
अपराधी-कुख्यात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 09/12/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।

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  3. गया अँधेरा-हुआ सवेरा,
    उखड़ गया है तम का डेरा,
    सूरज की किरणों को पाकर,
    कितना सुन्दर प्रात बन गया।...... बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  4. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने..

    उत्तर देंहटाएं

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