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मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

"अब रचो सुखनवर गीत नया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


लो साल पुराना बीत गया।
अब रचो सुखनवर गीत नया।।

फिरकों में था इन्सान बँटा,
कुछ अकस्मात् अटपटा घटा।
तब राजनीति का भिक्षुक भी,
झूठी हमदर्दी लिए डटा।
लोकतन्त्र का दानव फिर,
मानवता का घर रीत गया।
अब रचो सुखनवर गीत नया।।

जो कुटिया थी मंगलकारी,
वीरान हुई उसकी क्यारी।
भाषण में राशन बाँट रहे,
शासन में बैठे अधिकारी।
वो कैसे धीर धरेंगे अब,
जिनका दुनिया से मीत गया।
अब रचो सुखनवर गीत नया।।

अब दिवस सुहाने आयेंगे,
नूतन से हम सुख पायेंगे।
उपवन सुमनों से महकेगा,
फिर भँवरे गुन-गुन गायेंगे।
आशायें दिलाशा देती हैं,
अब रुदनभरा संगीत गया।
अब रचो सुखनवर गीत नया।।

नया सूर्य अब चमकेगा,
सारा अँधियारा हर लेगा।
जब सुख के बादल बरसेंगे,
तब रूपदेश का दमकेगा।
धावकमन बाजी जीत गया।
अब रचो सुखनवर गीत नया।। 

10 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्रीजी की रचनाये अनूठी तो होती ही हैं... यह अद्भुत, समयोचित और सटीक है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. लो साल पुराना बीत गया।
    अब रचो सुखनवर गीत नया।।

    नया सूर्य अब चमकेगा,
    सारा अँधियारा हर लेगा।
    जब सुख के बादल बरसेंगे,
    तब “रूप” देश का दमकेगा।
    मनधावक बाजी जीत गया।
    अब रचो सुखनवर गीत नया।।

    सृजन के आशावादी क्षण बांधे है ये रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. मित्र! आज 'क्रिसमस-दिवस' पर शुभ कामनाएं,! सब को सेंटा क्लाज सी उदारता दे और ईसा मसीह सी 'प्रेम-शक्ति'!
    तब राजनीति का भिक्षुक भी,
    झूठी हमदर्दी लिए डटा।
    लोकतन्त्र का दानव फिर,
    मानवता का घर रीत गया।
    बहुत सत्य कहा !

    उत्तर देंहटाएं

  5. बड़ा दिन ईसा का अवतरण दिवस मुबारक।

    क्रिसमस दिवस (Xmas Day )पर ऐसे ही सर्व समावेशी उद्गारों की आवश्यकता है। रचना प्रस्तुत की है आपने।

    उत्तर देंहटाएं

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