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शनिवार, 21 दिसंबर 2013

"दोहे-जीवन के आधार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

-१-
शीतलता और उष्णता, जीवन के आधार।
जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक ही संसार।।
-२-
चन्दा में होती नहीं, सूरज जैसी धूप।
शीतलता को बाँटता, चाँदी जैसा रूप।।
-३-
चन्दा चमका गगन में, छाया धवल प्रकाश।
लगे दमकने प्रीत से, धरा और आकाश।।
-४-
एक जगाता काम को, एक बताता काम।
देता एक थकान तो, दूजा दे आराम।।
-५-
इक दिन में इक रात में, जगा रहे हैं आस।
सूरज देता प्यास को, चाँद बुझाता प्यास।।
-६-
ओस चाटने से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।
तारों से होती नहीं, जग में कभी उजास।।
-७-
आदिकाल से चल रहा, धूप-छाँव का खेल।
चौराहों पर राह का, हो जाता है मेल।।

6 टिप्‍पणियां:

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