"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

"टोपी हिन्दुस्तान की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ये टोपी है बलिदान की, ये टोपी हिन्दुस्तान की।
ये तेरी भी, ये मेरी भी, ये मजदूर किसान की।।

भेद नहीं है जाति-धर्म का, देती है आदेश कर्म का,
अपनी टोपी धारण करना, काम नहीं है लाज-शर्म का,
ये प्रतीक का चिह्न हमारे, स्वाभिमान-सम्मान की।
ये तेरी भी, ये मेरी भी, ये मजदूर किसान की।।

जिसने इस सीधी-सादी, अपनी टोपी को अपनाया,
उसने ही अपने समाज में, ऊँचे पद को है पाया,
टोपी से पहचान हमारे, भारत के परिधान की।
ये तेरी भी, ये मेरी भी, ये मजदूर किसान की।।

जैसे हिम के बिना अधूरी, लगती कंचनजंघा है,
वैसे ही सिर टोपी के बिन, लगता नंगा-नंगा है,
आन-बान है यही हमारे, प्यारे देश महान की।
ये तेरी भी, ये मेरी भी, ये मजदूर किसान की।।

सबसे न्यारी अपनी टोपी, संविधान की पोषक है,
मानवता के लिए, हमारी निष्ठा की उद्घोषक है,
याद दिलाती हमको अपने, धर्म और ईमान की।
ये तेरी भी, ये मेरी भी, ये मजदूर किसान की।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर सामयिक रचना! ये टोपी निदुस्तान की!

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सफ़ेद भेड़ - काली भेड़ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  4. ये तेरी भी, ये मेरी भी, ये मजदूर किसान की।।
    बहुत सुन्दर ,सामयिक !
    नई पोस्ट मिशन मून
    नई पोस्ट ईशु का जन्म !

    उत्तर देंहटाएं
  5. आम आदमी को अब तक सब टोपी पहना रहे थे...पहली बार आम आदमी ने नेताओं को टोपी पहनायी है...

    उत्तर देंहटाएं
  6. सार्थक अभिव्यक्ति .आपको नव वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं .

    उत्तर देंहटाएं
  7. ये टोपी है बलिदान की ,

    ये तेरी भी ये मेरी भी ,

    सबके कुल सम्मान की।

    प्रस्तुति शाश्त्री जी की।

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails