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रविवार, 15 दिसंबर 2013

सत्ता-शासन भोग (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहज पन्थ को छोड़ कर, अपनाया हठ-योग।
जनहित के सद्कर्म में, सत्ता-शासन भोग।।
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शासन करने में करो, अब मत हील-हवाल।
अमल घोषणापत्र पर, करो केजरीवाल।।
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राजनीति से था किया, जब इतना अनुराग।
कड़ी चुनौती देख अब, रहा कर्म से भाग।।
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आज समझ में आ गया, नीयत में था खोट।
अगले आम चुनाव में, नहीं मिलेंगे वोट।।
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खुद को साबित कर रहा, वो बिल्कुल निर्दोष।
आँगन के गिनवा रहा, बोल-बोलकर दोष।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. एकदम सही और सटीक बात करते दोहे...कुछ लोगों की आदत होती है कि वे केवल दूसरों की शिकायत ही कर सकते हैं, कोई काम नहीं कर सकते| बड़ी-बड़ी बातें करना और वास्तव के कुछ कार्य करना; दोनों में बहुत फर्क है....इन्हें भी अब विधान-सभा के बाद संसद दिख रही है, जनता को नाटक करके बेवकूफ बनाने में तो इन्होने सबको पीछे छोड़ दिया | इन्हें अब जनता की गाढ़ी कमाई का चन्दा चाहिए हालांकि ये लेन-देन नहीं करते,इन्हें संसद में जाना है, हालांकि ये राजनीति नहीं कर रहे,काम की बाकी गारंटी दुसरे दें ताकि ये हर जिम्मेदारी से मुक्त होकर केवल उन्हें भला-बुरा कह सके या ब्लैकमेल कर सकें और अपनी राजनीति चमका सकें, अब इन्हें अन्ना नहीं चाहिए क्योकि ये उन्हें भुना चुके हैं | आगे के लिए प्रयास किया था पर अन्ना शायद इनकी मंशा समझ चुके हैं....

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  2. बहुत खूब ! मित्र , ईश्वर से प्रार्थना है कि राजनीति में कोई मसीहा आकार सत्ता-लोलुपता से हट कर सचमुच सुधार की ओर क़दम रक्खे !

    उत्तर देंहटाएं
  3. शासन करने में करो, अब मत हील-हवाल।
    अमल घोषणापत्र पर, करो केजरीवाल।।
    sateek v sundar

    उत्तर देंहटाएं
  4. ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे...

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  5. चलिए समय से सद्बुद्धि आ गई, अब वाणी पर थोड़ा नियंत्रण रख लें और अपने कहे पर चलें तो शायद अब जनता को वाकई एक अच्छा विकल्प मिल जाए जिसकी बहुत जरूरत है...

    उत्तर देंहटाएं

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