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रविवार, 29 दिसंबर 2013

"गीत सुनाती माटी अपने, गौरव और गुमान की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गीत सुनाती माटी अपने, गौरव और गुमान की।
दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

खेतों में उगता है सोना, इधर-उधर क्यों झाँक रहे?
भिक्षुक बनकर हाथ पसारे, अम्बर को क्यों ताँक रहे?
आज जरूरत धरती माँ को, बेटों के श्रमदान की।
दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

हरियाली के चन्दन वन में, कंकरीट के जंगल क्यों?
मानवता के मैदानों में, दावनता के दंगल क्यों
कहाँ खो गयी साड़ी-धोती, भारत के परिधान की।
दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

टोपी-पगड़ी, चोटी-बिन्दी, हमने अब बिसराई क्यों
अपने घर में अपनी हिन्दी, सहमी सी सकुचाई क्यों?
कहाँ गयी पहचान हमारे, पुरखों के अभिमान की।
दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

कहाँ गया ईमान हमारा, कहाँ गया भाई-चारा?
कट्टरपन्थी में होता, क्यों मानवता का बँटवारा?
मूरत लुप्त हो गयी अब तो, अपने विमल-वितान की।।
दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती बहुत ही सुन्दर रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  2. टोपी-पगड़ी, चोटी-बिन्दी, हमने अब बिसराई क्यों?
    अपने घर में अपनी हिन्दी, सहमी-सकुचाई सी क्यों?
    कहाँ गयी पहचान हमारे, पुरुखों के अभिमान की।
    दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

    सचमुच हमने अपने सम्मान को ताक पर रखकर विदेशी साजो सामान और आचार को अपना लिया है..

    उत्तर देंहटाएं
  3. खेतों में उगता है सोना, इधर-उधर क्यों झाँक रहे?
    भिक्षुक बनकर हाथ पसारे, अम्बर को क्यों ताँक रहे?
    आज जरूरत धरती माँ को, बेटों के श्रमदान की।
    दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

    अप्रतिम रचना हमारे वक्त का आदर्श स्वप्न बुनती देखती सी।

    उत्तर देंहटाएं

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