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बुधवार, 18 दिसंबर 2013

"आ भी जाओ...!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो भी मन में हो, कह जाओ!
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!

दूर-दूर रह कर, क्यों हल को खोज रहे हो,
मरुथल में जाकर, क्यों जल को खोज रहे हो,
गंगा तट पर प्यास बुझाने,
गड़वा लेकर आ भी जाओ।
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!

छलनी के छेदों मे तुम तो, केवल अवगुण देख रहे हो,
कूड़ा आँचल में रखते हो, सार-सार को फेंक रहे हो,
खुलकर के मन- सुमन मिलेंगे,
उपवन में अब आ भी जाओ।
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!

क्षमा-सरलता गुण हैं, ये मानव के हैं आभूषण भी,
वायु करती प्राण-प्रवाहित और भगाती है दूषण भी,
मत देखो पुतलों की काया,
जीवन भरने आ भी जाओ!
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!

10 टिप्‍पणियां:

  1. काव्य सौंदर्य से भरपूर रचना शैली माधुर्य देखते ही बनता है।

    काव्य सौंदर्य से भरपूर रचना शैली माधुर्य देखते ही बनता है।

    काव्य सौंदर्य से भरपूर रचना शैली माधुर्य देखते ही बनता है।

    दूर-दूर रह कर, क्यों हल को खोज रहे हो,
    मरुथल में जाकर, क्यों जल को खोज रहे हो,
    गंगा तट पर प्यास बुझाने,
    गड़वा लेकर आ भी जाओ।
    द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!

    जनपदीय शब्दों का सुन्दर प्रयोग किया है रचना में।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19-12-2013 को चर्चा मंच पर टेस्ट - दिल्ली और जोहांसबर्ग का ( चर्चा - 1466 ) में दिया गया है
    कृपया पधारें
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. हर जगह से घूमे के यहीं आयेंगे,
    नहीं आयेंगे तो कहाँ जायेंगे !!!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह क्‍या बात है, द्वार खुले हैं आ भी जाओ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. कविता के भाव एवं काव्य सौंदर्य अप्रतिम है .शब्दों में आकर्षण है |
    नई पोस्ट मेरे सपनों का रामराज्य (भाग १)

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर भाव..बार-बार जाने का मन होगा यहां तो

    उत्तर देंहटाएं

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