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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

बालकविता "रावण ने आतंक मचाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जो है एक शीश को ढोता। 
बुद्धिमान वह कितना होता।।
   बलशाली था और महान था।
यह दशानन ज्ञानवान था।।

वेद-शास्त्र का था ये ज्ञाता। 
यम तक इससे था घबराता।। 

पूजा इसका नित्य कार्य था। 
यह दुनिया में श्रेष्ठ आर्य था।। 

किन्तु दम्भ जब इसमें आया। 
इसने नीच कर्म अपनाया।। 

अनाचार अब यह करता था। 
सारा जग इससे डरता था।। 
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रावण ने आतंक मचाया। 
काल राम तब बनकर आया।। 

रूप धरा था वनचारी का। 
अन्त किया अत्याचारी का।। 

जो जग से आतंक मिटाता। 
वो घर-घर में पूजा जाता।। 

जो पापी को देता मार। 
होती उसकी जय-जयकार।।
 

6 टिप्‍पणियां:

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