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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

विविध दोहे "विरह और संयोग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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पथ में मिलते हर रोज ही, भाँति-भाँति के लोग।
होती तब ही मित्रता, जब बनता संयोग।।
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जैसे काम किये यहाँ, वैसा मिलते भोग।
अपने बस में है नहीं, विरह और संयोग।।
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सरल नहीं है सीखना, जीवन का संगीत।
शब्दों के ही भार से, बनता सुन्दर गीत।।
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रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख।
जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।।
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सरिता और तड़ाग के, सब ही जाते तीर।
मगर आचमन के लिए, गंगा का है नीर।।

4 टिप्‍पणियां:

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