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शनिवार, 15 अक्तूबर 2016

दोहे "शरदचन्द्र सौगात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

शशि की किरणों में भरी, सबसे अधिक उजास।
शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास।१।
--
आज धरा पर लक्ष्मी, आने को तैयार।
शरदपूर्णिमा पर्व पर, लेती हैं अवतार।२।
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पर्वों का पर्याय है, स्वयं कार्तिक मास।
सरदी का होने लगा, अब कुछ-कुछ आभास।३।
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दीपमालिका आ रही, लेकर अब उपहार।
देता शुभसन्देश यह, पावस का त्यौहार।४।
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चमक उठे हैं आज फिर, कोठी-महल-कुटीर।
नदियों में बहने लगा, निर्मल पावन नीर।५।
अमृत वर्षा कर रही, शरदपूर्णिमा रात।
आज अनोखी दे रहा, शरदचन्द्र सौगात।६।

खिला हुआ है गगन में, उज्जवल-धवल मयंक।
नवल-युगल मिलते गले, होकर आज निशंक।७।

निर्मल हो बहने लगा, सरिताओं में नीर।
मन्द-मन्द चलने लगा, शीतल-सुखद समीर।८।

शरदपूर्णिमा आ गयी, लेकर यह सन्देश।
तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।९।

फसल धान की आ गयी, खुशियाँ लेकर साथ।
भरा रहेगा धान्य से, मजदूरों का हाथ।१०।

3 टिप्‍पणियां:

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