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बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

व्यंग्य गीत "हँसी बहुत आया करती है" (रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मुझसे बतियाने को कोई,
चेली बन जाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

जान और पहचान नही है,
देश-वेश का ज्ञान नही है,
टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी,
हमें चिढ़ाया सा करती है!

तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

कोई बिटिया बन जाती है,
कोई भगिनी बन जाती है,
कोई-कोई तो बुड्ढे की,
साली कहलाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

आँख लगी तो सपना आया,
आँख खुली तो मैंने पाया,
बिन सिर पैरों की लिखने से,
सैंडिल पड़ जाया करती हैं!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

जाल-जगत की महिमा न्यारी,
वाह-वाही लगती है प्यारी,
अपनी करो प्रशंसा जमकर,
श्लाघा मन-भाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-10-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2501 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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