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रविवार, 9 अक्तूबर 2016

गीत "गंगा पुरखों की है थाती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



नद-नालों, सरिताओँ को भी,
जो खुश होकर अंग लगाती।
धरती की जो प्यास बुझाती,
वो पावन गंगा कहलाती।।

आड़े-तिरछे और नुकीले,
पाषाणों को तराशती है।
पर्वत से मैदानों तक जो,
अपना पथ खुद तलाशती है।
गोमुख से सागर तक जाती।
वो पावन गंगा कहलाती।।

फसलों को नवजीवन देती,
पुरखों का भी तर्पण करती।
मैल हटाती-स्वच्छ बनाती,
मन का निर्मल दर्पण करती।
कल-कल, छल-छल नाद सुनाती।
वो पावन गंगा कहलाती।।

चलना ही जीवन होता है
जो रुकता है वो सड़ जाता,
जो पत्रक नहीं लहराता है,
वो पीला पड़कर झड़ जाता।
चरैवेति सन्देश सिखाती।
वो पावन गंगा कहलाती।।

मैला और विषैला पानी,
गंगा में अब नहीं बहाओ।
समझो अपनी जिम्मेदारी,
गंगा का अस्तित्व बचाओ।
जो अपने पुरखों की थाती।
वो पावन गंगा कहलाती।। 

2 टिप्‍पणियां:


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