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शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

दोहे "जीने का अन्दाज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कपड़े छोटे हो गये, दिखता नंगा गात।
बिन पतझड़ झड़ने लगे, नये पुराने पात।
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बदल गया है आज तो, जीने का अन्दाज।
लोगों के आचरण से, है भयभीत समाज।।
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दुराचार से जगत को, कैसे मिले निजात।
नवयुग के इस दौर में, बदल गये हालात।
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बिना विचारे हो रहा, वाणी का संधान।
अब मानव के रूप में, छिपे हुए हैवान।।
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गोमाता भूखी मरे, पलते घर-घर श्वान।
मात-पिता का हो रहा, पग-पग पर अपमान।।
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तोड़ रही दम सभ्यता, आहत है परिवेश।
पुस्तक तक सीमित हुए, सन्तों के सन्देश।।
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 देख दुर्दशा धर्म की, मानवता हैरान।
फिरकों में अब बँट गये, राम और रहमान।।

4 टिप्‍पणियां:

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