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रविवार, 30 अक्तूबर 2016

दोहे "सबको दो उपहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


दीपक जलता है तभी, जब हो बाती-तेल।

खुशियाँ देने के लिए, चलता रहता खेल।१।
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जो तम हरने के लिए, खुद को रहा जलाय।
दीपक काली रात को,  आलोकित कर जाय।२।
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झिलमिल-झिलमिल जब जलें, दीपक एक कतार।
तब बिजली की झालरें, लगती हैं बेकार।३।
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मेधावी मेधा करे, उन्नत करे चरित्र।
मातु शारदे को नहीं, बिसरा देना मित्र।४।
--
लक्ष्मी और गणेश के, साथ शारदे मात।
बिना मात के जगत में, बने न कोई बात।५।
--
दीवाली का पर्व है, सबको दो उपहार।
आतिशबाजी का नहीं, दीपों का त्यौहार।६।
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दौलत के मद में नहीं, बनना कभी उलूक।
शिक्षा लेकर पेड़ से, करना सही सुलूक।७।

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