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गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

दोहे "जनता है कंगाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

बैंक हुई कंगाल सब, किसका है ये दोष।
उसको कहें दिवालिया, जिसका खाली कोष।।
--
प्रजातन्त्र में क्यों हुआ, तन्त्र प्रजा से दूर।
समझो इसके मूल में शासक को मगरूर।।
--
बैंकों के बाहर लगीं, लम्बी बहुत कतार।
अपने ही धन के लिए, जनता है लाचार।।
--
मासिक वेतन हो भले, चाहे साठ हजार।
पैसा पाने के लिए, मिलती है फटकार।।
--
सन्नाटा बाजार में, रुके जरूरी काज।
धन के आज अकाल से, सहमा हुआ समाज।।
--
इन्तजाम के बाद ही, करना था ऐलान।
अफरा-तफरी में किया, जारी क्यों फरमान।।
--
सेवक मनमानी करें, बनकर अफलातून।
रोज-रोज ही देश में, बदल रहे कानून।।
--
नयी करंसी से हुई, खाली अब टकसाल।
शासन मालामाल है, जनता है कंगाल।।
--
सच को लिखने से डरे, अब शायर-फनकार।
करता उनकी कलम को, मैं सौ-सौ धिक्कार।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. "सच को लिखने से डरे, अब शायर-फनकार।
    करता उनकी कलम को, मैं सौ-सौ धिक्कार"

    उत्तर देंहटाएं
  2. नयी करंसी से हुई, खाली अब टकसाल।
    शासन मालामाल है, जनता है कंगाल।।
    --
    सच को लिखने से डरे, अब शायर-फनकार।
    करता उनकी कलम को, मैं सौ-सौ धिक्कार।।
    ...बहुत सही सामयिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. मासिक वेतन हो भले, चाहे साठ हजार।
    पैसा पाने के लिए, मिलती है फटकार।।

    बिलकुल सही कहा आपने!!

    उत्तर देंहटाएं

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