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सोमवार, 19 दिसंबर 2016

दोहे "रँगे हुए हैं स्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

थूक-थूककर चाटते, उनका क्या आधार।
जंगल में जनतन्त्र के, रँगे हुए हैं स्यार।।
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सभी दलों के सदन में, थे प्रतिकूल विचार।
इसीलिए होती सदा, लोकतन्त्र की हार।।
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दाँव-पेच के खेल से, चलता है जनतन्त्र।
बिना लोक के फल रहा, लोकतन्त्र का मन्त्र।।
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गरजे तो बरसे नहीं, किया दिखावा मात्र।
उल्लू सीधा कर रहे, बेपेंदे के पात्र।।
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ताल ठोंक कर शान से, करते प्रबल प्रहार।
किया पलायन सदन से, जीत गयी सरकार।।

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