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बुधवार, 28 दिसंबर 2016

गीत "सब स्वप्न हो गये अंगारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
गधे चबाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!

काँपे माता काँपे बिटिया, भरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससे, क्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

जो इठलाते हैं दौलत पर, वो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंग,वो खूब कमाते द्रव्य-माल,
वाणी में केवल हैं नारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

नव-वर्ष हमेशा आता है, सुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

रोटी-रोजी के संकट में, बस गीत-प्रीत के भाते हैं,
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

टूटा तन-मन भी टूटा है, अभिलाषाएँ ही जिन्दा हैं,
कब जीवन में होंगी बहार, यह सोच रहा कारिन्दा हैं,
चमकेंगें कब सुख के तारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

4 टिप्‍पणियां:

  1. सच है गरीब-गुरबों के लिए क्या नया क्या पुराना साल ..
    सामयिक चिंतन प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. मोबाईल पर, पढने में थोड़ी असुविधा हुई किन्तु सफल लेखन ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-12-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2571 में दिया जाएगा ।
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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