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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

ग़ज़ल "करने मलाल निकले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

ये पात-पात निकलेवो डाल-डाल निकले
मुर्दार बस्तियों में, लेकर मशाल निकले 

परदेशियों के आगे, घुटने वो टेकते हैं,
ईमान के शिकारी, गठरी खँगाल निकले 

निर्धन का जो अभी तक, दामन भी सिल न पाये 
शतरंज के खिलाड़ी, चलने को चाल निकले

लोगों की गर्दनों पर, खंजर चला रहे हैं
सपने हसीं दिखाकर, करने कमाल निकले 

सीमा पे अपने सैनिक, दिन-रात मर रहे हैं 
कायर बने हुए से, करने मलाल निकले 

वोटों के ये भिखारी, दर-दर भटक रहे हैं
अपनों के वास्ते ही, बुनने को जाल निकले।

है नाम भी सुरीला और "रूप" सन्त का सा
मीठी छुरी से सबको, करने हलाल निकले।

2 टिप्‍पणियां:

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