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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

समीक्षा "कदम-कदम पर घास" (मनोज'कामदेव')

कदम-कदम पर घास


डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

टनकपुर-रोड, खटीमा (उत्तराखंड)
मूल्य-200/-

प्रकाशक- आरती प्रकाशन, लालकुआँ (नैनीताल)
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंकजी ने अपने कर कमलों द्वारा अपनी पुस्तक स्वंय भेंट की जिसका नाम है 'कदम-कदम पर घास'। यह पुस्तक दोहा-संग्रह है। यह दोहा-संग्रह मैंने जब पढ़ना शुरू किया तो मैं इस दोहा-संग्रह में डूबता ही चला गया और डूबता ही चला गया समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला। डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी के पास शब्दों की वो भाषा है जो वो अपनी बात को बहुत ही सरल शब्दों से आम पाठक के जन मानस में अपना स्थान बता लेती है। इस पुस्तक में 75 विषयों पर दोहे लिखे हैं। बड़ा साहित्यकार वही होता है जो थोड़े शब्दों में ही अपनी बात को अपने पाठकों तक पहुँचा सके जिसमें डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी बहुत ही खरे उतरे हैं।

        सच कहूँ तो डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी ने इस दोहा-संग्रह में विभिन्न पहलुओं को छुआ है विशेषकर माता-दिवस पर,साहित्य पर,छ्न्द विधान पर,राजनीति पर, साक्षरता पर,जनतंत्र पर,जीवन के आधार पर,हमारे त्योहारों पर, समय पर,महापुरूषों पर, और प्राकृतिक-उपादानों के माध्यम से संसार और अपने पाठको को ज्ञान और उपदेश प्रत्यक्ष रूप से देते दिखाई देते हैं और समस्त समस्याओं को चिन्तन हेतू बाध्य करने वाली समस्याओं पर ध्यान आकर्षित किया है समाज का। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में छ्न्दों को महत्वपूर्ण माना जाता है तथा आज के दौर में छन्द विधान में लिखना एक बेहद कठिन कार्य है परन्तु डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी ने इस कठिन कार्य को एक नये अंदाज़ से लिखा और अपने दोहों को एक नया आयाम भी दिया। जिसे आने वाले वक्त में बड़े आदर के भाव से साहित्य की दुनियाँ में पढ़ा जायेगा।
        आपके द्वारा लिखे इस दोहे संग्रम में दोहे एक से बढ़कर एक हैं जो दोहे मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के स्मृति पटल पर अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ने में सफल रहे जिसका आपको बहुत-बहुत बधाई व साधुवाद। इस पुस्तक में कुछ अति-विशिष्ठ दोहे तो आला दर्जें के हैं जो इस प्रकार हैं-
1. वृक्ष बचाते धरा को,देते सुखद समीर।

लहराते जब पेड़ हैंघन बरसाते नीर।। 
(जल जीवन आधार)

2. लालन-पालन में दियाममता और दुलार।
बोली-भाषा को सिखाकरती माँ उपकार।। 
(माता-दिवस) 

3. पेड़ लगाकर कीजिएअपने पर उपकार।
करो हमेशा यत्न सेघरती का सिंगार।। 
(धरा दिवस)

4. समय न करता है दयाजब अपनी पर आय।
बली और विद्वान को, देता धूल चटाय।। 
(समय)

5. छ्न्दशास्त्र का है नहींजिनको कुछ भी ज्ञान।
वो कविता के क्षेत्र मेंपा जाते सम्मान।। 
(तुलसी और कबीर)

6. वेदों ने हमको दियाआदिकाल में ज्ञान।
इनके जैसा है नहींजग में छ्न्दविधान।।
(छ्न्दविधान)

7. अनुष्ठान वो है सफलजिसका हो आधार।
लोकतंत्र के सामनेझुक जाती सरकार।। 
(लोकतंत्र)

8. विषय-वस्तु में सार होलेकिन हो लालित्य।
दुनियाँ को जो दे दिशावो ही है साहित्य।। 
(साहित्य)

9. सुथरे तन में ही रहेनिर्मल मन का वास।
मोह और छ्लछ्ह्म भीनहीं फटकता पास।। 
(खोलो मन का द्वार) 

10. लुप्त हुआ है काव्य कानभ में सूरज आज।
बिना छ्न्द रचना रचेंज्यादतर कविराज।। 
(मन की टीस)

11. मक्कारों ने हर लियाजनता का आराम।
बगुलों ने टोपी लगाजीना किया हराम।। 
(टोपीदार दोहे)

12. पेड़ नीम का झेलतापीड़ा को चुपचाप।
देता शीतल छाँव को, हरता सबके ताप।। 
(नीम का पेड़) 

13. भरा पिटारा ज्ञान का, देखो इसको खोल। 
इस गठरी में हैं भरेशब्द बहुत अनमोल।। 
(अन्तर्जाल)

14. भाषा,धर्म,प्रदेश सेऊपर होता देश।
भेदभाव,असमानतासे बढता है क्लेश।। 
(मातृभूमि)

15. त्योहारों में बाँटिएखुशी और आनन्द।
सम्बन्धों में कीजिएबैर-भाव को बन्द।। 
(खिचड़ी)

16. वर्तमान जो आज हैकल हो जाए अतीत।
कालचक्र के चक्र मेंजीवन हुआ व्यतीत।। 
(रचता पात्र कुम्हार)

17. बैंगन का करना नहींकोई भी विश्वास।
माल-ताल जिस थाल मेंजाते उसके पास।। 
(चापलूस बैंगन)

18. गाँधी जी के देश मेंरावण करते राज।
काराग्रह मेम बन्द हैंराम-लक्ष्मण आज।। 
(वोटनीति)

19. मोटी रकम डकार करकरते बहस वकील।
गद्दारों के पक्ष मेंदेते तर्क दलील।। 
(अन्धा कानून)

20. नौका लहरों में फँसीबेबस खेवनहार।
ऐसा नाविक चाहिएजो ले जाये पार।। 
(विविध दोहावली)

21. अंगारा सेमल हुआवन में खिला पलाश।
मन के उपवन में उठीभीनी मन्द-सुवास।। 
(पलाश के फूल)
      अंत में यही कहना चाहुँगा कि आज के साहित्य के क्षेत्र में डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंकजी बहुत ही अच्छा लिख रहे हैं। मैं उनके सफल भविष्य की कमना करता हूँ और आशा करता हूँ वो यूँहीं निरन्तर लिखते रहें। यह दोहा- संग्रह पठनीय और संग्रहणीय भी है। पुनः आपको बधाई।
मनोज'कामदेव'

कवि/लेखक/समीक्षक
09818750159

2 टिप्‍पणियां:

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