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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

दोहे "गया दिवाकर हार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


सरदी पड़ती ग़ज़ब की, गया दिवाकर हार।
मैदानी भूभाग में, कुहरे की है मार।।
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लकड़ी-ईंधन का हुआ, अब तो बड़ा अभाव।
बदन सेंकने के लिए, कैसे जले अलाव।।
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हैं काजू-बादाम के, आसमान पर भाव।
मूँगफली को खाइए, मेरा यही सुझाव।।
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शीतलता की मार से, है गरीब भयभीत।
बच्चे-बूढ़ों के लिए, कठिन झेलना शीत। 
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सूखा पाला पड़ रहा, फसल रही है सूख।
लगती अधिक गरीब को, कंगाली में भूख।।
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नीयत चाहे नेक हो, नियमन में है खोट।
लगते लोग कतार में, पाने को कुछ नोट।।
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ताल और लय के बिना, बिगड़ा सुर-आलाप।
दो हजार का नोट तो, आज बना अभिशाप।।

2 टिप्‍पणियां:

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