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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

दोहा गीत "उपवन का परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कल तक मस्त वज़ीर थे, आज हुए हैं त्रस्त।
आम आदमी ने किये, सभी हौसले पस्त।।

दशकों से खाते रहे, नोच-नोचकर देश।
वीराना सा कर दिया, उपवन का परिवेश।।
छेद स्वयं के पात्र में, करने लगे दलाल।
हुए एकजुट लोग तब, दशा देख विकराल।।
मत के प्रबल प्रहार से, दुर्ग कर दिया ध्वस्त।
आम आदमी ने किये, सभी हौसले पस्त।।

दुर्बल को खाने लगीं, जब ये मोटी मीन।
जीने के अधिकार सब, लिए इन्होंने छीन।
लोकतन्त्र में बचा तब, मत का शेष विकल्प।
अन्तस की आवाज का, मन में था संकल्प।।
अब वो खाली हो गये, कल तक जो थे व्यस्त।
आम आदमी ने किये, सभी हौसले पस्त।।

जनता का जनतन्त्र है, आज हुआ आभास।
मत की ताकत पर सदा, रखना है विश्वास।।
खून-खराबे का नहीं, भारत में कुछ काम।
परिवर्तन का आम ही, करते पूरा काम।।
चाहे जिस दल का करें, उगता सूरज अस्त।
आम आदमी ने किये, सभी हौसले पस्त।।

निर्धन को धनवान सा, सुलभ सदा हो न्याय।
नहीं किसी के साथ हो, भेद-भाव अन्याय।।
भारत माता कर रही, कब से यही पुकार।
भ्रष्ट सियासत की नहीं, भारत को दरकार।।
संसद में पहुँचे नहीं, रिश्वत के अभ्यस्त।
आम आदमी ने किये, सभी हौसले पस्त।।

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