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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

समीक्षा-दोहा-कृति 'खिली रूप की धूप' (समीक्षक-मनोज कामदेव)

पुस्तक समीक्षा
समीक्ष्य- दोहा-कृति- 'खिली रूप की धूप'

दोहाकार-'डा.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रथम संस्करण-2016

मूल्य-200/-
प्रकाशक-आरती प्रकाशनलालकुआँ 
(नैनीताल) उत्तराखंड
समीक्षक-मनोज कामदेव कवि/लेखक/समीक्षक
गाजियाबाद(यू.पी.)।
(मो.न.09818750159)

    समीक्ष्य दोहा-कृति 'खिली रूप की धूपकवि के उत्कृष्टसामाजिक प्रभावपूर्ण व ह्र्दयस्पर्शी दोहों का मात्र एक गुलदस्ता नहीं बल्कि एक समग्र उपवन है। इस दोहे संग्रह में जिन्दगी के विभिन्न रंगअनेक पहलूअनेक यथार्थअनुभूतियाँसामाजिक चिंतनआँसूमुस्कानपीरहर्ष-विषाद के अनेक परिदृश्य इस संग्रह में अति श्रेष्ठताकलात्मकतागहनता व परिपवक्ता के साथ समाहित किए गए हैं।
    कवि की वैचारिकता में वैशिष्ट्य हैतो कथ्य में गहराई व वजन भी है। सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से हर दोहा खरा उतरता है। प्रस्तुति में रवानगी है तो विषयवस्तु में मौलिकताप्रखरतातरलता व विविधता भी है। तभी तो 144 पृष्ठीय कृति में जीवन के यथार्थ व सत्य को उकेरते हुए प्रायः हर विषयवस्तु के दोहे समाहित हो गये हैं।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक जी ने 'खिली रूप की धूप' में उर्दू और एंव हिन्दी के शब्दों का उत्तम प्रयोग किया है तथा अपने मन के भावों को शब्दों के माध्यम से इस पुस्तक के फलक पर सजीवरूप में उतार दिया है। इस पुस्तक को मैंने पढ़ा और यह मेरे दिल को छू गई ये पुस्तक। उदाहरण के तौर पर उसके कुछ दोहों के अंश प्रस्तुत हैं-
माँ ममता का रूप हैपिता सबल आधार
मात-पिता सन्तान कोकरते प्यार अपार।।
(तात मुझे बल दीजिए)
गुरु-शिष्य पागल हुएज्ञान हुआ विकलांग
नहीं भरोसा कर्म परबाँच रहे पंचांग।।
(पागलपन)
आभासी संसार हैआभासी सम्बन्ध
मिलने-जुलने के लिएहो जाते अनुबन्ध।।
(मुखपोथी बनाम फेसबुक)
हिन्दी का दिन बन गयाअब तो एक मखौल
अंग्रेजी के भक्त भीबजा रहे हैं ढोल।।
(हिन्दी दिवस)
अपनी सूरत देख करविदित हुआ परिणाम
उगते सूरज को करेंझुककर सभी प्रणाम।।
(मत होना मगरूर)
अब मजहब के नाम पर, होते ओछे कर्म
मुल्ला-पण्डित-पादरीके चंगुल में धर्म।।
(धर्म)
ढाई आखर में छिपाजीवन का विज्ञान
माँगे से मिलता नहींकभी प्यार का दान।।
(छन्दों का विज्ञान)
पूरब से होता शुरूनूतन जीवन सत्र
दिनचर्या के भेजतासूरज लिखकर पत्र।।
(आशा का अध्याय)
कच्चे धागों से बँधीरक्षा की पतवार
रोली-अक्षत-तिलक मेंछिपा हुआ है प्यार।।
(रक्षाबन्धन)
मिलते हैं संसार मेंपग-पग पर आघात
जाँच-परख कर कीजिएसाझा मन की बात।।
(शैवाल)
थोथी-थोथी सी लगेंसरकारी तकरीर
कैसे निर्मल हो यहाँगंगा जी का नीर।।
(लोभ)
नहीं बुढ़ापे में चलेंयौवन जैसे पाँव
बरगद बूढ़ा हो चलाकब तक देगा छाँव।।
(उलझे तार)
इतने पर भी बोलतापाक झूठ पर झूठ
जब बनता माहौल कुछतब ही जाता रूठ।।

(वन्देमातरम्)

कण-कण में जो रमा है, वो ही है भगवान
मंदिर-मस्जिद में उसेखोज रहा नादान।।
(ईश्वर आता याद)
भारत माँ कोख सेजन्मा पूत कलाम
करते श्रद्वा-भाव सेउसको आज सलाम।।
(ए.पी.जे.अब्दुल कलाम)
सरकारी अनुभाग मेंरिश्वत की भरमार
आम आदमी पूछताये कैसी सरकार।।
(नौकरशाही)
नीम करेला जगत मेंकभी न मीठा होय
मगर न छोड़े दुष्टतापीकर निर्मल तोय।।
(अच्छे दिन)
जर्रे-जर्रे में बसाराम और रहमान
सिखलाते इंसानियतपूजा और अजान।।
(ईद मुबारक)
दोहे लिखने में कभीचलता नहीं जुगाड़
नियमों से करना नहींकोई भी खिलवाड़।।
(नियम-विधान)
पेड़ कट गये धरा केबंजर हुई जमीन
प्राणवायु घटने लगीछाया हुई विलीन।।
(पर्यावरण)
दोहा छोटा छ्न्द हैकरता भारी मार
सीधे-सादे शब्द हीकरते सीधा वार।।
(दोहा छोटा छन्द)
    वास्तव में हर दोहा एक से एक बढकर एक हैं। मुखपृष्ठ सादा पर आकर्षक है, छपाई उत्तम है। निष्कर्ष यह कि यह दोहा-संग्रह साहित्य की एक बहुत बड़ी धरोहर है और "खिली रूप की धूप"समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
समीक्षक-मनोज कामदेव कवि/लेखक/समीक्षक

गाजियाबाद(यू.पी.)।

(मो.न.09818750159)

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