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मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

दोहे "जनता जपती मन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


सात दशक में भी नहीं, आया कुछ बदलाव।
खाते माल हराम का, अब भी ऊदबिलाव।।
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चाहे धरती पर रहें, कैसे भी हालात।
होती इनके शीश पर, फूलों की बरसात।।
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आजादी के यज्ञ में, प्राण किये बलिदान।
लेकिन अमर शहीद का, नहीं मिला सम्मान।।
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आये कोई भी भले, भारत में सरकार।
मगर न शासक ने किया, कोई कभी विचार।।
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हर-हर हो या हाथ हो, सब हैं एक समान।
जनता को उल्लू बना, चला रहे दूकान।।
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मत पाने तक के लिए, जनता है भगवान।
फिर तो मनमानी करें, पाँच साल सुलतान।।
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लोकतन्त्र के नाम का, जनता जपती मन्त्र।
राजतन्त्र जैसा लगे, जनता को जनतन्त्र।।
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फाँसी खा कर मर रहे, धरती के भगवान।
  लेकिन शासक देश के, सोये चादर तान।।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-12-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2564 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. सार्थक और सटीक दोहे ... सच को स्पष्ट कहते हुए ...

    उत्तर देंहटाएं

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