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गुरुवार, 12 जुलाई 2018

दोहे "लोग हो रहे मस्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सिक्कों में बिकने लगा, दुनिया में ईमान।
लोग रूप की धूप परकरते हैं अभिमान।।

सदाचार का हो गयादिन में सूरज अस्त। 
अपनी ही करतूत परलोग हो रहे मस्त।।

तन-मन मैले हो रहेझूठे हैं उपवास। 
मेल-जोल का हो गयामेला बहुत उदास।।

पंथ भिन्न तो क्या हुआसबका है ये देश।
मेल-जोल से ही यहाँ, बदलेगा परिवेश।।

भारत माता कर रहीकब से करुण पुकार। 
गद्दारों को मार दोओ भगवा सरकार।।

अन्न और जल हो गयादूषण से भरपूर। 
जनसाधारण तो हुआआज मजे से दूर।।

जनता के ही राज मेंजनता सुख से दूर। 
मजदूरी मिलती नहींपढ़े-लिखे मजबूर।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सिक्कों में बिकने लगा, दुनिया में ईमान।
    लोग रूप की धूप पर, करते हैं अभिमान।।
    कब ढल जाती धूप है रहता नहीं गुमान ,
    कभी न करिये रूप पर बित्ता भर अभिमान।
    बेहतरीन सन्देश देती दोहावली शास्त्रीजी की।

    उत्तर देंहटाएं

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