"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 14 जुलाई 2018

ग़ज़ल "इस जीवन की शाम ढली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कर्कश सुर से तो होती है, खामोशी की तान भली
जल जाता शैतान पतिंगा, शम्मा सारी रात जली

दो पल का तूफान, तबाही-बरबादी को लाता है
कभी न थकती मन्द हवा, जो लगातार दिन-रात चली

बचपन-यौवन साथ न देता, कभी किसी का जीवन भर
सिर्फ बुढ़ापे के ही संग में, इस जीवन की शाम ढली

सूखे भी हों पात शज़र के, वो छाया ही देते हैं
छलते हैं मुस्कानों से, ग़ुलशन के छलिया फूल-कली

करता दग़ा हमेशा है ये, नहीं रूप पर जाना तुम
लोग हमेशा से कहते हैं, होता है ये हुस्न छली 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद खूबसूरत अंदाज़ की रचना कथ्य भी मनभावन।


    बचपन-यौवन साथ न देता, कभी किसी का जीवन भर
    सिर्फ बुढ़ापे के ही संग में, इस जीवन की शाम ढली
    करता दग़ा हमेशा है ये, नहीं “रूप” पर जाना तुम
    लोग हमेशा से कहते हैं, होता है ये हुस्न छली

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails