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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

प्रकाशन "शैल सूत्र पत्रिका में मेरे दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आहत वृक्ष कदम्ब कातकता है आकाश। 
अपनी शीतल छाँव मेंबंशी रहा तलाश।।

माटी जैसी हो वहीदेता है आकार।
कितने श्रम पात्र कोगढ़ता रोज कुम्हार।।

शब्दों में अपने नहींकरता कभी कमाल।
कच्ची माटी जब मिलेदूँ साँचों में ढाल।।

चिन्तन-मन्थन के लिएमिलता कच्चा माल।
रोज-रोज लिख दीजिएसच्चा-सच्चा हाल।।

ठोकर खा कर सभी कोमिल जाती है राह। 
लेकिन होनी चाहिएमन में सच्ची चाह।।

झंझावातों में सभीबने हुए हैं बैल। 
मंजिल तब कैसे मिलेजब मन में हो मैल।।

कंकड़-काँटों से भरीप्यार-प्रीत की राह। 
बन जाती आसान तबजब मन में हो चाह।।

लोकतन्त्र में न्याय सेअक्सर होती भूल। 
कौआ मोती निगलताहंस फाँकते धूल।।

जिनको प्यार-दुलार सेपाल रहे हों शूल।
सबके मन को मोहतेउपवन के वो फूल।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. काश ! तथाकथित नेता भी इस पर ध्यान दे सकें !

    उत्तर देंहटाएं
  2. शब्दों के तो आप भगवान् हैं
    दोहे लाजवाब हैं
    सब एक से बढ़ कर एक

    उत्तर देंहटाएं

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