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बुधवार, 18 जुलाई 2018

दोहे "ढोंगी और कुसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बने हुए बहुरूपिए, ढोंगी और कुसन्त।
जिनका बारहमास ही, होता रोज बसन्त।।

थोड़े से गद्दार हैं, थोड़े से मक्कार।
नैतिकता का देश में, खिसक रहा आधार।।

गंगा बहती झूठ की, गिरी सत्य पर गाज। 
बढ़ते जाते पाप हैं, दूषित हुआ समाज।।

समझो खारे नीर का, कुछ तो मोल-महत्व। 
सागर से कम है नहीं, आँसू का अस्तित्व।।

हारा है कर्तव्य से, दुनिया में अधिकार। 
श्रम-निष्ठा से ही सदा, बनता है आधार।।

विरह तभी है जागता, जब दिल में हो आग। 
विरह-मिलन के मूल में, होता है अनुराग।।

किया-धरा कुछ भी नहीं, बनते लोग नवाब। 
योगदान जिनका नहीं, पूछें वही हिसाब।।

प्यार-प्रीत की राह में, आया है व्यापार। 
महकेगा कैसे भला, नैसर्गिक शृंगार।।

क्यों बेटों की चाह में, रहे बेटियाँ मार। 
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।

संविधान में कीजिए, अब ऐसे बदलाव। 
माँ बहनों के साथ में, बुरा न हो वर्ताव।।

लुटे नहीं अब देश में, माँ-बहनों की लाज। 
बेटी को शिक्षित करो, उन्नत करो समाज।।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.7.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3037 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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