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शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

दोहे "कलयुग में इंसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नीम करेला जगत में, कभी न मीठा होय।
मगर न छोड़े दुष्टता, पीकर निर्मल तोय।।

राजनीति में चल रही, साँठ-गाँठ भरपूर। 
सिंहासन की दौड़ में, मीत हो गये दूर।।

आदत पल-पल बदलता, कलयुग में इंसान। 
देख जगत के ढंग को, बदल रहा भगवान।।

सब अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध। 
मांस नोचने के लिए, मँडराते हैं गिद्ध।।

अब तक भी समझे नहीं, जो अपनी औकात।
बात-बात में कर रहे, मृग नयनी की बात।।

दादा जी के कबर में, लटक रहे हैं पाँव।
लेकिन अब भी खोजते, वो आँचल की छाँव।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. अब तक भी समझे नहीं, जो अपनी औकात।
    बात-बात में कर रहे, मृग नयनी की बात।।

    सर, ऐसे ही लोग बात करते हैं. काम करने वाले बोलते कहां हैं. सुंदर दोहा.

    उत्तर देंहटाएं

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