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मंगलवार, 31 जुलाई 2018

संस्मरण "ऐसे पुत्र भगवान किसी को न दें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

संस्मरण
सम्बन्धों में हों जहाँ, छोटी-बड़ी दरार।
धरती पर कैसे कहें, उसे सुखी परिवार।।
     आज बहुत ही भारी मन से यह संस्मरण साझा कर रहा हूँ। मुझसे 11 वर्ष बड़े श्री गुरू सहाय भटनागर तैंतालिस वर्षों से मेरे अभिन्न मित्र हैं। सन 1975 में जब मैं नैनीताल जिले की तराई में स्थित गाँव बनबसा में आया था तब वह भी बनबसा हेडवर्क्स में स्टोरकीपर के पद पर स्थानान्तरित होकर आये थे। उनके दो विवाहित पुत्र और एक विवाहित पुत्री है। पुत्री तो बरेली में सम्पन्न परिवार में है मगर दोनों पुत्र बिल्कुल निकम्मे हैं। श्री गुरू सहाय भटनागर  जी “बदनाम” के उपनाम से अपनी शायरी करते थे। आपका ग़ज़ल संग्रह "शाम-ए-तन्हाई" भी 25 साल पहले प्रकाशित हो चुका है। भटनागर साहिब ने अपनी 50 बीघा गाँव की जमीन बेचकर दोनों पुत्रों के भरण-पोषण में लगा दी।
     रिटायरमेंट के बाद आप खटीमा में आ गये, आवास विकास में एक मकान बना लिया उसमें रहने लगे। ग्यारह हजार की पेंशन पर ही आप अपना गुजारा करते थे। आपकी श्रीमती जी 20 साल से हृदय रोग से ग्रस्त हैं। दोनों पति-पत्नी में बहुत प्रेम था। लगभग 6 महीने पहले भटनागर जी को भूलने की बीमारी लग गयी और वह बढ़ती ही गयी। तीन माह पूर्व तो हालत यह हो गयी कि वह घर वालों के प्रति हिंसक व्यवहार करने लगे। उनकी श्रीमती ने उन्हे बरेली के अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाया परन्तु बीमारी बढ़ती ही गयी। बरेली के जिस अस्पताल में वे भर्ती थे वहाँ भी जवाब दे दिया गया। अन्ततः उन्हें घर ले आये।
     भटनागर जी के नाक और गले में श्वाँस और तरल भोजन के लिए रबड़ की नलियाँ पड़ीं थी। आपकी श्रीमती जी बीमार होते हुए भी अपने पति की सेवा में कोई कोताही नहीं करती थी। छोटा पुत्र और उसका परिवार आपके साथ ही रहता था। परन्तु पिता की बीमारी के बारे में सुनकर बड़े पुत्र ने भी खटीमा में ही आकर सपरिवार डेरा डाल दिया और पिता के मरने का इन्तजार करने लगा कि कब पिता जी इस दुनिया से पलायन करें और कब वह मकान पर कब्जा करे।    
       एक दिन बड़ी पुत्रवधु ने भटनागर साबव की खाने और श्वाँस  लेने की नलियाँ निकाल दी। इस पर भटनागर साहिब की पत्नी को गहरा आघात लगा और हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गयी।
       ईश्वर की लीला देखिए पहले भटनागर साहब को जाना था और उनकी पत्नी 18 जुलाई, 2018 को इस दुनिया को छोड़ कर चली गयीं। मेरे मित्र श्री गुरू सहाय भटनागर “बदनाम” जी इस दुनिया में हैं तो सही लेकिन उनका होना और न होना एक बराबर है। वो न तो किसी को पहचानते हैं और न ही कुछ बोलते हैं। पीठ और कुहनियों में घाव हो गये हैं। न जाने कहाँ उनकी श्वाँस अटकी है।
      मेरे जैसे उनके इष्ट-मित्रों के मन से यही आवाज निकलती है कि ईश्वर किसी को भी श्री गुरू सहाय भटनागर जी के पुत्रों जैसी सन्तान न दे।
मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धा को प्रकट करने हेतु
श्री गुरू सहाय भटनागर ”बदनाम” जी की
एक ग़ज़ल इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा हूँ।
कब मुलाकात होगी
इशारों-इशारों में जब बात होगी
नज़र से नज़र की मुलाकात होगी

वो ज़ुल्फ़ों को अपनी बिखेरेंगे जब-जब
घटाओं से घिर-घिर के बरसात होगी

लबों पर तबस्सुम की हल्की-सी जुम्बिश
हसीं शोख़-सी उनसे इक बात होगी

बढ़ेगी फिर उनसे मोहब्बत यहाँ तक
मिलन की फिर उनसे शुरूआत होगी

वो शरमा  के जब अपना मुँह फेर लेंगे
मुहब्बत के फूलों की बरसात होगी

वो चल तो दिए दिल में तूफ़ां उठाकर
कि बदनामसे कब मुलाकात होगी 
गुरू सहाय भटनागर 'बदनाम'

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद हृदयस्पर्शी सच्चाई बहुत कड़वी है।
    भगवान जी से विनती है कि उन्हें जीवन के कष्टों से मुक्त कर दें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. दारुण मर्मस्पर्शी, प्रभु उनको प्रारब्धों से मुक्ति प्रदान करें ।

    उत्तर देंहटाएं

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