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बुधवार, 15 अप्रैल 2020

कविता "शून्य में है जिन्दगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शून्य में दुनिया समायी, शून्य से संसार है। 
शून्य ही विज्ञान का अभिप्राण है आधार है।।

शून्य से ही नाद है और शून्य से ही शब्द हैं।
शून्य के बिनप्राण-मनसम्वेदना निःशब्द हैं।।

शून्य में हैं कल्पनाएँशून्य में है जिन्दगी।
शून्य में है भावनाएँशून्य में है बन्दगी।।

शून्य ही है जख़्मउनका शून्य ही मरहम बना।
शून्य के बिन गणित कासिद्धान्त तो है अनमना।।

शून्य में ही चैन हैंऔर शून्य मे ही मौन हैं।
शून्य जैसे सार्थक कोसब समझते गौण हैं।।

शून्य से गणनाएँ होतीशून्य ही आकाश हैं।
ग्रह-उपग्रहचाँद-तारेशून्य के ही पास हैं।।

शून्य से जीवन शुरू है, शून्य पर ही अन्त है।
आदि से ही शून्य की महिमा अपार-अनन्त है।।

शून्य के बिन साधना का भी अधूरा ज्ञान है।
शून्य से ही तो हमारी विश्व में पहचान है।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. शून्य में ही चैन हैं, और शून्य मे ही मौन हैं..... बहुत बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  2. शून्य से ही सब उपजा है और शून्य में ही सब खो जायेगा ...

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 16.4.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3673 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  4. शून्य से जीवन शुरू है, शून्य पर ही अन्त है।
    आदि से ही शून्य का महिमा अपार-अनन्त है।।
    बहुत खूब !!अत्यंत सुन्दर ।

    जवाब देंहटाएं
  5. शून्य ही आदि है शून्य ही अंत ।
    वाह्ह्ह्!!
    अभिनव सृजन आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं

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