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शनिवार, 18 अप्रैल 2020

गीत "मरुस्थलों में कलियाँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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जीवन के हर चौराहे पर, गलियाँ मिल जाती हैं।
मरुस्थलों में कभी-कभी, कलियाँ खिल जाती हैं।।
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बेहोशी में पड़े रहे तो, प्राण निकल जायेंगे,
पाकर पवन झकोरें, सोये गुल खिल जायेंगे,
भूली-बिसरी बातकहानी में ढल जाती हैं।
मरुस्थलों में कभी-कभी, कलियाँ खिल जाती हैं।।
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मेंहदी तो सजनी-साजन के, हाथों में रचती है,
उसकी महक हृदय के, कोने-कोने में बसती है,
भँवरे को फिर से, उसकी गुंजन मिल जाती हैं।
मरुस्थलों में कभी-कभीकलियाँ खिल जाती हैं।।
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रिश्तों की बुनियाद, समझना मत कव्वाली है,
दिल से करना प्यार, मुहब्बत भोली-भाली है,
सफर, सफर है, इसमें यादें आती जाती हैं,
मरुस्थलों में कभी-कभीकलियाँ खिल जाती हैं।।
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प्रेम अमर है, प्रेम अजर है, उसकी अपनी है भाषा,
ढाई आखर में ही जग की, रची-बसी है जिज्ञासा,
मिलन-यामिनी में, उलझी लड़ियाँ खुल जाती हैं।
मरुस्थलों में कभी-कभीकलियाँ खिल जाती हैं।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. मरुस्थलों में, कभी-कभार ही सही, खिलने वाली कलियाँ भविष्य के प्रति आस्था जगाती हैं

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  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  4. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19 -4 -2020 ) को शब्द-सृजन-१७ " मरुस्थल " (चर्चा अंक-3676) पर भी होगी,

    आप भी सादर आमंत्रित हैं।

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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं

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