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मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

गीत "मातृभू को सिर नवायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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एक दीपक तुम जलाओएक दीपक हम जलायें।
आओ मिलकर हम धरा कोरौशनी से जगमगायें।।
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आज दूषित सभ्यता कीचल रहीं हैं आँधियाँ,
आग में अलगाव की तोजल रही हैं वादियाँ,
नफरतों को दूर करकेएकता की धुन बजायें।
आओ मिलकर हम धरा कोरौशनी से जगमगायें।।
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वतन में गन्दी सियासतसेंकती हैं रोटियाँ,
स्वप्न ज़न्नत के दिखाकरनोचती हैं बोटियाँ,
सूखते परिवेश में हमनेह की फसलें उगायें।
आओ मिलकर हम धरा कोरौशनी से जगमगायें।।
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अन्न-जल खाकर वतन में, हम पले हैं,
थामकर अँगुली वतन की हम चले हैं,
आओ श्रद्धा-भाव से उस मातृभू को सिर नवायें।
आओ मिलकर हम धरा कोरौशनी से जगमगायें।।
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जगत में अस्तित्व है जिससे हमारा,
सभी का होता यहाँ पर है गुजारा,
शौर्य के, अभिमान के हम गीत आओ गुनगुनायें।
आओ मिलकर हम धरा कोरौशनी से जगमगायें।।
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4 टिप्‍पणियां:

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