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रविवार, 26 अप्रैल 2020

गीत "अमलतास-पीले फूलों के गजरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सूरज की भीषण गर्मी से,
लोगो को राहत पहँचाता।।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
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डाली-डाली पर हैं पहने
झूमर से सोने के गहने,
पीले फूलों के गजरों का,
रूप सभी के मन को भाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
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दूभर हो जाता है जीना,
तन से बहता बहुत पसीना,
शीतल छाया में सुस्ताने,
पथिक तुम्हारे नीचे आता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
--
स्टेशन पर सड़क किनारे,
तन पर पीताम्बर को धारे,
दुख सहकर, सुख बाँटो सबको,
सीख सभी को यह सिखलाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
--

5 टिप्‍पणियां:

  1. स्टेशन पर सड़क किनारे,
    तन पर पीताम्बर को धारे,
    दुख सहकर, सुख बाँटो सबको,
    सीख सभी को यह सिखलाता।
    लू के गरम थपेड़े खाकर,
    अमलतास खिलता-मुस्काता।।
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, आदरणीय शास्त्री जी।

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (27-04-2020) को 'अमलतास-पीले फूलों के गजरे' (चर्चा अंक-3683) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****

    जवाब देंहटाएं
  4. स्टेशन पर सड़क किनारे,
    तन पर पीताम्बर को धारे,
    दुख सहकर, सुख बाँटो सबको,
    सुन्दर गुणों की खान और आँखों को सुखद अनुभूति करवाते अमलतास पर बहुत सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह !लाजवाब सृजन आदरणीय सर
    सादर

    जवाब देंहटाएं

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