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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

ग़ज़ल "इमदाद आयेगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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चमन में मुस्कराहट अब खिजां के बाद आयेगी
उजड़ जायेगा जब गुलशन तभी इमदाद आयेगी
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भयानक जलजलों के सामने होंगे खड़े तब ही
मकानों में अगर पुख्ता कभी बुनियाद आयेगी
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अभी मासूम पौधों में समझदारी नदारत है
गुजर जायेंगे जब लम्हे हमारी याद आयेगी
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जमीं को कर दिया बंजर नये साइंसदानों ने
उजड़ जायेगा जब गुलशन तो देशी खाद आयेगी
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घमण्डी चूर है अभिमान में बारूद के बूते
न जाने कब वतन में सादगी रूदाद आयेगी
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तबाही कर रहे दुनियाँ में शैतानी सिकन्दर हैं
न जाने कब मुकाबिल को बड़ी तादाद आयेगी
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इसी उम्मीद पर भँवरा चमन में गुनगुनाता है
कयामत तक कभी तो रूप की फरियाद आयेगी
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा गुरुवार(०९-०४-२०२०) को 'क्या वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं ?'( चर्चा अंक-३६६६) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. उम्मीद का दीपक जलाता सुंदर सृजन सर , सादर नमस्कार

    जवाब देंहटाएं

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