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गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

गीत "कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


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पतझड़ के मौसम में,
सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?
बीज वही हैं, वही धरा है,
ताल-मेल अनुबन्ध नही,
हर बिरुअे पर 
धान 
लदे हैं,
लेकिन उनमें गन्ध नही,
खाद रसायन वाले देकर,
महक कहाँ से पाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?
उड़ा ले गई पश्चिम वाली,
आँधी सब लज्जा-आभूषण,
गाँवों के अंचल में उभरा,
नगरों का चारित्रिक दूषण,
पककर हुए कठोर पात्र अब,
क्या आकार बनाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

गुरुओं से भयभीत छात्र, 
अब नहीं दिखाई देते हैं, 
शिष्यों से अध्यापक अब तो, 
डरे-डरे से रहते हैं, 
संकर नस्लों को अब कैसे, 
गीता ज्ञान कराऊँ मैं? 
वीराने मरुथल में, 
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं? 
पतझड़ के मौसम में, 
सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं? 
वीराने मरुथल में, 
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?
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8 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (17-04-2020) को "कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?" (चर्चा अंक-3674) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है

    जवाब देंहटाएं
  2. सब मिल कर सर्वशक्तिमान से इस संकट से जल्द छुटकारा दिलाने की प्रार्थना करें !

    जवाब देंहटाएं
  3. जाने कैसी मरीचिका है जो आज के इंसान को भटका रही है -कहाँ जा कर इसका अंत होगा ,यह भी पता नहीं.

    जवाब देंहटाएं
  4. अति सुंदर सृजन सर ,सादर नमस्कार आपको

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत बहुत सुंदर।
    सार्थक वैचारिक सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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