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गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

गीत "बदन काँपता थर-थर-थर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छिपा क्षितिज में सूरज राजा,
ओढ़ कुहासे की चादर।
सरदी से जग ठिठुर रहा है,
बदन काँपता थर-थर-थर।।
--
कुदरत के हैं अजब नजारे,
शैल ढके हैं हिम से सारे,
दुबके हुए नीड़ में पंछी,
हवा चल रही सर-सर-सर।
सरदी से जग ठिठुर रहा है,
बदन काँपता थर-थर-थर।।

कोट पहन और ओढ़ रजाई,
दादा जी ने आग जलाई,
मिल जाती गर्मी अलाव से,
लकड़ी पाना है दूभर।
सरदी से जग ठिठुर रहा है,
बदन काँपता थर-थर-थर।।

टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे,
सिकुड़े बैठे हैं बेचारे,
तन को गर्मी पहुँचाने को,
भाग रहे हैं इधर-उधर।
सरदी से जग ठिठुर रहा है,
बदन काँपता थर-थर-थर।।

मिलते नहीं कहीं अब कण्डे,
बिना गैस के चूल्हे ठण्डे,
महँगाई की मार पड़ी है,
जीवन जीना है दूभर।
सरदी से जग ठिठुर रहा है,
बदन काँपता थर-थर-थर।।
--

13 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 18-12-2020) को "बेटियाँ -पवन-ऋचाएँ हैं" (चर्चा अंक- 3919) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. इधर दिल्ली में तो बहुत ठंड है सर। उत्तराखंड में तो और ज्यादा होगी।

    जवाब देंहटाएं
  3. शीत ऋतु का सुंदर वर्णन !

    जवाब देंहटाएं
  4. सर्दी की ठिठुरन का बहुत ही सुन्दर शब्द चित्रण
    वाह!!!!

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर चित्रों के साथ मोहक गीत जाड़े पर ।
    मनभावन सृजन।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर रचना... सही कहा आपने... आजकल थर-थर ही काँप रहा है बदन...

    जवाब देंहटाएं

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