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सोमवार, 21 दिसंबर 2020

गीत "धारा यहाँ विधान की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बिगड़ रही है सूरत-सीरतभारत देश महान की।
हालत बद से बदतर होतीअपने श्रमिक-किसान की।।

--

आज कड़ाके की सरदी मेंजाड़ा-पाला फाँक रहे,
दाता जग के हाथ पसारेकेन्द्र-बिन्दु को ताँक रहे?
पड़ी किसलिए आज जरूरतसड़कों पर संधान की।
हालत बद से बदतर होतीअपने श्रमिक-किसान की।।

--

हरियाली के चन्दन वन मेंथोप रहे हठधर्मी क्यों?
आज सुशासन का आदत में अहमभाव की गर्मी क्यों
बिना बहस के पारित क्यों हैंधारा यहाँ विधान की।
हालत बद से बदतर होतीअपने श्रमिक-किसान की।।

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आज बगावत पर आमादा, टोपी-पगड़ी-साफा क्यों
दिल्ली की सीमा पर पसराचारों ओर सियापा क्यों?
इज्जत लगी दाँव पर अब तोधरती के भगवान की।
हालत बद से बदतर होतीअपने श्रमिक-किसान की।।
--
कहाँ गया ईमान हमारा, कहाँ गया भाई-चारा?
संसद के गलियारों में है, मानवता का बँटवारा?
लोकतन्त्र में बू आती है, राजतन्त्र अभिमान की।
हालत बद से बदतर होतीअपने श्रमिक-किसान की।।

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8 टिप्‍पणियां:

  1. समसामायिक रचना

    साधुवाद 🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-12-20) को "शब्द" (चर्चा अंक- 3923) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. "कहाँ गया ईमान हमारा, कहाँ गया भाई-चारा?
    संसद के गलियारों में है, मानवता का बँटवारा?"

    बिल्कुल सही कहा सर!

    जवाब देंहटाएं
  4. यथार्थपरक,समसामयिक रचना.. आपको मेरा नमन..!

    जवाब देंहटाएं
  5. समसामयिक परिस्थितियों पर प्रभावी सृजन ।

    जवाब देंहटाएं

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