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गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

गीत "हार गये हैं ज्ञानी-ध्यानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--
नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
हीटर-गीजर शुरू हो गये,
नहीं सुहाता ठण्डा पानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--
बालक विद्यालय ना जाते,
कोरोना से सब घबराते,
 मोबाइल से मन बहलाते,
रोग भयंकर फैला जग में,
हार गये हैं ज्ञानी-ध्यानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।
--
कहता पापी पेट हमारा,
बिना कमाए नही गुजारा,
काम बिना नहीं कोई चारा,
श्रम करने से जी न चुराओ,
ऋतुएँ तो हैं आनी जानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--
चूल्हे और अलाव जलाओ,
गर्म-गर्म भोजन को खाओ,
काम समय पर सब निबटाओ,
खाना-सोना और कमाना,
जीवन की है यही कहानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--

7 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 04-12-2020) को "उषा की लाली" (चर्चा अंक- 3905) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. 'हीटर-गीजर शुरू हो गये,
    नहीं सुहाता ठण्डा पानी।'... परम सत्य डॉ. शास्त्री! सरल-सुन्दर रचना के लिए बधाई!

    जवाब देंहटाएं
  3. बालक विद्यालय ना जाते,
    कोरोना से सब घबराते,
    मोबाइल से मन बहलाते,
    रोग भयंकर फैला जग में,
    हार गये हैं ज्ञानी-ध्यानी।
    जाड़े पर आ गयी जवानी।
    --
    वाह!!!
    बहुत सुन्दर सामयिक लाजवाब गीत।

    जवाब देंहटाएं
  4. सहज शब्दों में आप बहुत कुछ कह जातें हैं, नमन सह।

    जवाब देंहटाएं
  5. यथार्थ पर सामायिक सृजन , सुंदर सार्थक।

    जवाब देंहटाएं

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