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मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

दोहे "सरकारी फरमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रास न आया कृषक को, सरकारी फरमान।
झंझावातों में घिरे, निर्धन श्रमिक-किसान।।
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शीतल-शीतल भोर है, शीतल ही है शाम।
अच्छा लगता है बहुत, शीतकाल में घाम।।
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आसमान को छू रहे, लकड़ी के तो दाम।
कूड़ा-करकट को जला, लोग सेंकते चाम।।
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खास मजा हैं लूटते, कठिनाई में आम।
महँगे होते जा रहे, चना और बादाम।।
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चहल-पहल घटने लगी, उजड़ रहे हैं ग्राम।
नगरों का रुख कर रहे, अब तो लोग तमाम।
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करते ढोंग-ढकोसले, खाते मोहनभोग।
भावनाओं से खेलते, सत्ताधारी लोग।।
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तानाशाही कर रही, क्यों अपनी सरकार।
सत्याग्रह को किसलिए, हैं किसान लाचार।।
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अहम भाव को छोड़ कर, थोड़ा करो विचार।
कठिनाई है कौन सी, करो माँग स्वीकार।।
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हुए आज मजबूर हैं, जग के पालनहार।
क्रय-विक्रय का फसल की, उनको दो अधिकार।।
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बिना बहस पारित किया, क्यों ऐसा कानून।
जो किसान हित में नहीं, बदलो वो मजमूनन।।

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9 टिप्‍पणियां:

  1. समय को प्रतिबिंबित करते इन दोहों के लिए नमन आपको आदरणीय 🙏🌷🙏

    कृपया मेरे ब्लॉग साहित्य वर्षा में आपका स्वागत है, पधार कर उत्साहवर्धन करने की प्रार्थना है ...

    https://sahityavarsha.blogspot.com/2020/12/blog-post_22.html?m=0

    जवाब देंहटाएं
  2. ए आज मजबूर हैं, जग के पालनहार।
    क्रय-विक्रय का फसल की, उनको दो अधिकार।।
    --
    बिना बहस पारित किया, क्यों ऐसा कानून।
    जो किसान हित में नहीं, बदलो वो मजमूनन।।

    जवाब देंहटाएं
  3. बिना बहस पारित किया, क्यों ऐसा कानून।
    जो किसान हित में नहीं, बदलो वो मजमूनन।।
    बहुत सटीक।

    जवाब देंहटाएं
  4. समयानुरूप सार्थक यथार्थवादी दोहे।
    सुंदर सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  5. वर्तमान परिस्थिति पर सार्थक सृजन, सादर नमस्कार सर

    जवाब देंहटाएं

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