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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

"वही वो हैं वही हम हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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वही चौपाल-चौबारे,
वही गलियाँ, वही द्वारे,
मगर इन्सान बेदम हैं!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

वही गुलशन वही कलियाँ,
वही फूलों भरी डलियाँ,
घटी खुशियाँ, बढ़े ग़म हैं!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

हँसी झूठी, कमर टूटी,
लबों पर बेबसी फूटी,
नज़ारों की नज़र नम है!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

वही पत्ते, वही डाली,
वही भोजन, वही थाली,
वही वो हैं वही हम हैं!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

14 टिप्‍पणियां:

  1. वही गर्दिश वही गलताँ वही गर्दो-गुबारे..,
    वही महताब वही तनाब वही सीम सितारे..,
    वही आलमों-अलमस्त वही बादे-बहारें..,
    तन्हाई का आलम है दिलों में उल्फत कम है.....

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  3. एक सार्थक अभिव्यक्ति.....बहुत बढ़िया.....

    जवाब देंहटाएं
  4. वही पत्ते, वही डाली,
    वही भोजन, वही थाली,
    वही वो हैं वही हम हैं!
    दिलों में उल्फतें कम हैं!!

    सुन्दर !आशय और बदलाव का दर्द !लिए है रचना


    वही पत्ते, वही डाली,
    वही भोजन, वही थाली,
    वही वो हैं वही हम हैं!
    दिलों में उल्फतें कम हैं!!

    जवाब देंहटाएं
  5. हँसी झूठी, कमर टूटी,
    लबों पर बेबसी फूटी,
    नज़ारों की नज़र नम है!
    दिलों में उल्फतें कम हैं!! khas aur sundar prastuti hetu aabhar Mayank ji

    जवाब देंहटाएं
  6. कल 17/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    जवाब देंहटाएं
  7. नज़ारों की नज़र नम है!
    दिलों में उल्फतें कम हैं!!

    जय हिन्द !

    जवाब देंहटाएं

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