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शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

“शैल-सूत्र में प्रकाशित रचना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
मेरी एक रचना
त्रयमासिक पत्रिका
“शैल-सूत्र”
के अंक अक्टूबर-दिसम्बर में
पृष्ठ-25 पर प्रकाशित हुई है।
आपके अवलोकनार्थ इस रचना को
ब्लॉग पर भी प्रकाशित कर रहा हूँ।
सुख का सूरज नहीं गगन में
कुहरा पसरा है आँगन में

पाला पड़ता शीत बरसता
सर्दी में सब बदन ठिठुरता
तन ढकने को वस्त्र न पूरे
निर्धनता में जीवन मरता
पौधे मुरझाये गुशन में
कुहरा पसरा है आँगन में

आपाधापी और वितण्डा
गैस बिना चूल्हा है ठण्डा
लोकतन्त्र का आजादी तो
बन्धक है अब राजभवन में
कुहरा पसरा है आँगन में

विदुरनीति का हुआ सफाया
दुर्नीती ने पाँव जमाया
आदर्शों को धता बताकर
देश लूटकर सबने खाया
खर-पतवार उगी उपवन में
कुहरा पसरा है आँगन में

4 टिप्‍पणियां:

  1. समाज का सत्य व्यक्त आपके शब्दों में।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सटीक कटाक्ष हमारे राजनीति के जोकरों पर।

    बहुत सुन्दर सार्थक व्यंग्य चित्र हमारे आज का :

    सुख का सूरज नहीं गगन में
    कुहरा पसरा है आँगन में

    पाला पड़ता शीत बरसता
    सर्दी में सब बदन ठिठुरता
    तन ढकने को वस्त्र न पूरे
    निर्धनता में जीवन मरता
    पौधे मुरझाये गुलशन में
    कुहरा पसरा है आँगन में

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपने वर्तमान परिदृश्य की सुंदर समीक्षा की है ......हमेशा की तरह ही बढ़िया रचना महोदय....

    उत्तर देंहटाएं

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