"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

"ग़ज़ल-नदी का काम है बहना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बहुत मज़बूत बन्धन है, इसे कमजोर मत कहना
बँधी जो प्यार की डोरी, बहुत अनमोल वो गहना

रिवाज़ों और रस्मों की, यहाँ परवाह है किसको
भले अवरोध कितने हों, नदी का काम है बहना

ज़माने के सितम के सामने, झुकना कभी भी मत
मुकद्दर के थपेड़ों को, हमेशा प्यार से सहना

अमर है आत्माएँ जब, तो क्यों है मौत से डरना
मुहब्बत की रवायत है, सलीबों पर टँगे रहना

फिज़ाओं का भरोसा क्या, न जाने कब बदल जायें
बड़ी मुश्किल से गुलशन ने, बसन्ती “रूप” है पहना

6 टिप्‍पणियां:

  1. पहली पीढ़ी : -- हम जाति-धर्म को नहीं मानते
    दूसरी पीढ़ी : -- हम देसी- बेसी को नहीं मानते
    तीसरी पीढ़ी : -- हम शादी-वादी को नहीं मानते
    चौथी पीढ़ी : -- हम विवाहेत्तर सम्बन्धों को नहीं मानते
    पाँचवी पीढ़ी : -- चलो मम्मी-पापा मम्मी -पापा खेलते हैं
    छठवी पीढ़ी : -- अरे ये कुत्ता नहीं नहीं मनुष्य नहीं नहीं, अरे ये कुत्ते जैसा बालक किसका है.....?

    उत्तर देंहटाएं
  2. रिवाज़ों और रस्मों की, यहाँ परवाह है किसको
    भले अवरोध कितने हों, नदी का काम है बहना......

    खुबसूरत ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. फिज़ाओं का भरोसा क्या, न जाने कब बदल जायें
    बड़ी मुश्किल से गुलशन ने, बसन्ती “रूप” है पहना
    ..बहुत सुन्दर ..बसंती रंग का क्या कहना..यह तो प्रकृति का है गहना ..

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails