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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

"फूल खिले हैं पलाश में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कितने हसीन फूल, खिले हैं पलाश में
फिर क्यों भटक रहे हैं, चमन की तलाश में

पश्चिम की गर्म आँधियाँ, पूरब में आ गयी
ग़ाफ़िल हुए हैं लोग, क्षणिक सुख-विलास में

जब मिल गया सुराज तो, किरदार मर गया
शैतान सन्त सा सजा, उजले लिबास में

क़श्ती को डूबने से, बचायेगा कौन अब
शामिल हैं नयी पीढ़ियाँ, अब तो विनाश में

किसको सही कहें अब, और कौन ग़लत है
असली ज़हर भरा हुआ, नकली मिठास में

काग़ज़ के फूल में, कभी आती नहीं सुगन्ध
मसले गये सुमन सभी, भीनी सुवास में

बदला हुआ है “रूप”, रंग और ढंग भी
अन्धे चलें हैं देखने, दुनिया उजास में

11 टिप्‍पणियां:

  1. जब मिल गया सुराज तो, किरदार मर गया
    शैतान सन्त सा सजा, उजले लिबास में ..

    पलाश के लाजवाब मक्ते के साथ सामयिक शेर ... बहुत लाजवाब शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. शहरो-शहर दस्तो-सहरा, खुद अपनी ही सनाश में..,
    भटक रहा क्यूँ फ़िरदौस बादे, बहारों की तलाश में.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज की स्थितियाँ व्यक्त करती पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर अप्रतिम सार्थक अभिव्यक्ति सांगीतिक ताल लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  6. पश्चिम की गर्म आँधियाँ, पूरब में आ गयी
    ग़ाफ़िल हुए हैं लोग, क्षणिक सुख-विलास में-
    sateek v sarthak .aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन सर डॉन ब्रैडमैन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. क़श्ती को डूबने से, बचायेगा कौन अब
    शामिल हैं नयी पीढ़ियाँ,अब तो विनाश में...

    बहुत खूब,सुंदर गजल ...!

    RECENT POST - फागुन की शाम.

    उत्तर देंहटाएं
  9. आज 26/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  10. पश्चिम की गर्म आंधियां,पूरब में आ गईं---
    बहुत खूब कहा आपने----

    उत्तर देंहटाएं

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