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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

"दोहे-वासन्ती उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिन ज्यों-ज्यों बढ़ने लगा, चढ़ने लगा खुमार।
मौसम सबको बाँटता, वासन्ती उपहार।१।

चहक उठी है वाटिका, महक उठा है रूप।
भँवरे गुंजन कर रहे, खिली-खिली है धूप।२।

जैसे-जैसे आ रहा, प्रेमदिवस नज़दीक।
वैसे-वैसे हो रहा, मौसम भी रमणीक।३।

जोड़ों पर चढ़ने लगा, प्रेमदिवस का रंग।
रीत पुरानी है वही, मगर नये हैं ढंग।४।

कर्कश सुर में गा रहे, भौंडे-भौंडे गीत।।
नये साज के शोर में, बदल गया संगीत।५।

बरस रहा शृंगार है, सरस रहा मधुमास।
जड़-चेतन को हो रहा, मस्ती का आभास।६।

काँवड़ लेने चल पड़े, शंकर जी के भक्त।
शिव आराधन में हुआ, मन सबका अनुरक्त।७।

4 टिप्‍पणियां:

  1. "कर्कश सुर में गा रहे, भौंडे-भौंडे गीत।।
    नये साज के शोर में, बदल गया संगीत"

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्यारी सी कविता, वासंती उपहार की।

    उत्तर देंहटाएं

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